न जाने कितने मेहमानों ने घर आके लूटा था इसे..
दोस्तों ने दोस्त बनकर धोखा दिया था इसे..
भरे पूरे एक बच्चे को यतीम बना के छोड़ गई थी दुनिया
अब खुद जीके दिखाओ ये कहके छोड़ गई थी दुनिया..
तब खुद अपने ज़ख्मों पे मरहम भी लगाया था
और खुद ही अपनी परवरिश भी की थी...
गिरते पड़ते..लड़खड़ाते धीरे धीरे अपने कदमो पे चलना सीखा था इसने
अपने हाथों से मिटटी खोद के फसल उगाना सीखा था इसने
जब कभी बीमार था..तो कईयों ने अपना खून देके ताक़त दी थी इसे..
अनजान मोड़ पे बड़े बुजुर्गों ने ऊंगली पकड़ के सही राह दिखाई थी इसे...
अपने आप खाना सीखा, और अब दूसरों को खिलाता हैं
देख देख के बहुत सीखा..अब दूसरों को सीखता हैं..
छोटे छोटे कदम बढ़ा कर आज इस मकाम पे आ गया हैं
जहाँ दुनिया अब उसे न देखे तो बहुत पछताएगी
६३ सालों से एक ऊंगली छोड़ के दूसरी पकड़ी हैं...
पर अब बालिग़ हो गया हैं ये..अब किसी की ऊंगली की ज़रुरत नहीं..
अब एक दोस्त, एक हमकदम की बारी हैं जो सही राह दिखाए इसे..
नहीं तो किसी जवां लड़के की तरह भटक सकता हैं ये॥जिसका कोई रहबर न हो...
आओ अपना फ़र्ज़ निबायें...हिन्दुस्तान अब हमारी ज़िम्मेदारी हैं..
आओ हिस्दुस्तान को सही राह दिखाए,,,
Sunday, August 15, 2010
Wednesday, July 28, 2010
चुनते हैं सभी...
चुनते हैं सभी ख़ुदा को...जब बात आती हैं चुनने की
में बेकार ही इतराता रहा सिर्फ इंसान बनकर
न कोई चमत्कार की शक्ति मुझमें, न काबू चाँद-सूरज पर
कोई क्यों याद करता मुझे बाज़ी अपनी जीत कर...
शायर हो..रदीफ़ - काफियों से दिल बहलता होगा तुम्हारा
कहाँ नशा आता तुम्हे मेरी बेकार की बातें सुनकर???
दिल की स्याही बस नोक पे आके रुक जाती हैं..
पूछती हैं ..क्या खत्म हो जायेंगे जज़्बात सारे सिर्फ ग़ज़ल बनकर???
तुम तो ख़ुदा बन गए जीते जी ही..बहुत ख़ुशी हैं इस बात की मुझे
हैराँ हूँ "काफिर" के में याद भी न रहा किसीको मरकर??
में बेकार ही इतराता रहा सिर्फ इंसान बनकर
न कोई चमत्कार की शक्ति मुझमें, न काबू चाँद-सूरज पर
कोई क्यों याद करता मुझे बाज़ी अपनी जीत कर...
शायर हो..रदीफ़ - काफियों से दिल बहलता होगा तुम्हारा
कहाँ नशा आता तुम्हे मेरी बेकार की बातें सुनकर???
दिल की स्याही बस नोक पे आके रुक जाती हैं..
पूछती हैं ..क्या खत्म हो जायेंगे जज़्बात सारे सिर्फ ग़ज़ल बनकर???
तुम तो ख़ुदा बन गए जीते जी ही..बहुत ख़ुशी हैं इस बात की मुझे
हैराँ हूँ "काफिर" के में याद भी न रहा किसीको मरकर??
Monday, July 5, 2010
Sunday, July 4, 2010
राम के नाम पे
राम के नाम पे
इतने लोगों की जान लेके भी तुम नहीं दिला सके राम को अपना घर
ना जाने कितनी सौगंधे खाई और खिलाई थी सियासत वालों ने...
मस्जिद तोड़ के भी मंदिर तो ना बना सके राम का,
हाँ, नफरत का घर ज़रूर बना दिया लाखों दिलों में हमेशा हमेशा के लिए
ताज्जुब होता हैं ये देख के, के कैसे बस कुछ एक लोग,
करोड़ों की सोच बदल सकते हैं.
मैंने कितनी कोशिश की थी करीम भाई से ५ रूपए कम करवाने की, हनुमान की फोटो के लिए
पर वो नहीं माना था और कहा था, " भगवान् की फोटो में कम नहीं होता हैं साब"...और फिर से अपना अखबार लेके बैठ गया था.
पता नहीं कैसे वो अल्लाह के नाम को और भगवान् की तस्वीर को एक साथ रखता था अपने ठेले में...
कभी कोई भी प्रॉब्लम नहीं हुई उसे तो...
कोई फर्क नहीं था उसके लिए राम और अल्लाह के बीच...
बस अपने काम से काम था...और खुश था वो.
काश एक करीम हम सबके दिल में होता तो...
राम के नाम पे..इतने लोग रावन ना बनते....
इतने लोगों की जान लेके भी तुम नहीं दिला सके राम को अपना घर
ना जाने कितनी सौगंधे खाई और खिलाई थी सियासत वालों ने...
मस्जिद तोड़ के भी मंदिर तो ना बना सके राम का,
हाँ, नफरत का घर ज़रूर बना दिया लाखों दिलों में हमेशा हमेशा के लिए
ताज्जुब होता हैं ये देख के, के कैसे बस कुछ एक लोग,
करोड़ों की सोच बदल सकते हैं.
मैंने कितनी कोशिश की थी करीम भाई से ५ रूपए कम करवाने की, हनुमान की फोटो के लिए
पर वो नहीं माना था और कहा था, " भगवान् की फोटो में कम नहीं होता हैं साब"...और फिर से अपना अखबार लेके बैठ गया था.
पता नहीं कैसे वो अल्लाह के नाम को और भगवान् की तस्वीर को एक साथ रखता था अपने ठेले में...
कभी कोई भी प्रॉब्लम नहीं हुई उसे तो...
कोई फर्क नहीं था उसके लिए राम और अल्लाह के बीच...
बस अपने काम से काम था...और खुश था वो.
काश एक करीम हम सबके दिल में होता तो...
राम के नाम पे..इतने लोग रावन ना बनते....
ghoomna
दिनभर तुम मेरे जेहन में रहती हो...
पर जैसे ही घर के बहार कदम रखता हूँ, तुम या तो मेरी कार की passenger सीट पे या तो मेरी bike की पिछली सीट पे आके बैठ जाती हो
बड़ा मज़ा आता हैं तुम्हारे साथ घूमने में...
और में भी बड़े चाव से अपना शहर दिखता हूँ तुम्हे...
"वो रोड जो आगे से लेफ्ट मुड़ता हैं ना, वहाँ...कमाल अमरोही का स्टूडियो हैं
और ये पूरा industrial एरिया...
वो देखो...वो अमिताभ बच्चन का घर हैं और सामने जुहू बीच हैं..."
तुम भी बड़े ध्यान से देखती हो सब जो में दीखाता हूँ.
साच में, बड़ा मज़ा आता हैं तुम्हारे साथ घूमने में...
पर पिछले कुछ दिनों से काफी काम हैं और बहुत busy हूँ में भी, और कहीं बहार नहीं ले जा पाया हूँ तुम्हे
और इसीलिए तुम भी शायद रूठी हो मुझसे ...
काफी दिनों से bike की पिछली सीट खाली हैं और कार की passenger सीट तुम्हे मिस करती हैं..
आजाओ अब..आजाओ ना
बरसात का मौसम हैं..और ये शहर बारिशों में बहुत सुन्दर दीखता हैं....
पर जैसे ही घर के बहार कदम रखता हूँ, तुम या तो मेरी कार की passenger सीट पे या तो मेरी bike की पिछली सीट पे आके बैठ जाती हो
बड़ा मज़ा आता हैं तुम्हारे साथ घूमने में...
और में भी बड़े चाव से अपना शहर दिखता हूँ तुम्हे...
"वो रोड जो आगे से लेफ्ट मुड़ता हैं ना, वहाँ...कमाल अमरोही का स्टूडियो हैं
और ये पूरा industrial एरिया...
वो देखो...वो अमिताभ बच्चन का घर हैं और सामने जुहू बीच हैं..."
तुम भी बड़े ध्यान से देखती हो सब जो में दीखाता हूँ.
साच में, बड़ा मज़ा आता हैं तुम्हारे साथ घूमने में...
पर पिछले कुछ दिनों से काफी काम हैं और बहुत busy हूँ में भी, और कहीं बहार नहीं ले जा पाया हूँ तुम्हे
और इसीलिए तुम भी शायद रूठी हो मुझसे ...
काफी दिनों से bike की पिछली सीट खाली हैं और कार की passenger सीट तुम्हे मिस करती हैं..
आजाओ अब..आजाओ ना
बरसात का मौसम हैं..और ये शहर बारिशों में बहुत सुन्दर दीखता हैं....
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