Wednesday, November 24, 2010
Thursday, October 21, 2010
मैंने
एक बार पूरी काइनात से पंगा ले लिया था मैंने...
एक बार चाँद और सूरज के बीच झगडा करवा दिया था मैंने
मुझे क्या पता था के वो सचमुच चला जाएगा
सिर्फ मजाक में ही तो उसे अलविदा कहा था मैंने
और तबसे भागता फिरता हैं खुदा मुझसे
जबसे इंसानी ताक़त का एक नमूना दिखाया था मैंने
पता नहीं था के पूरे-पुरे शहर बहा लेजायेगा वो
बस यूँही एक बार सावन को अपनी पूरी ताक़त दिखने को कहा था मैंने
चाँद टुकड़े टुकड़े हो के गिर पड़ा था कल रात को
गुस्से में आकर एक तारा आसमान की तरफ फेंका था मैंने
दीवानगी अभी भी उतिनी ही हैं 'काफिर' की, बस नुमाइश नहीं करता
कई बार वरना सिर्फ रौशनी के लिए चाँद को कमरे में टांगा था मैंने
एक बार चाँद और सूरज के बीच झगडा करवा दिया था मैंने
मुझे क्या पता था के वो सचमुच चला जाएगा
सिर्फ मजाक में ही तो उसे अलविदा कहा था मैंने
और तबसे भागता फिरता हैं खुदा मुझसे
जबसे इंसानी ताक़त का एक नमूना दिखाया था मैंने
पता नहीं था के पूरे-पुरे शहर बहा लेजायेगा वो
बस यूँही एक बार सावन को अपनी पूरी ताक़त दिखने को कहा था मैंने
चाँद टुकड़े टुकड़े हो के गिर पड़ा था कल रात को
गुस्से में आकर एक तारा आसमान की तरफ फेंका था मैंने
दीवानगी अभी भी उतिनी ही हैं 'काफिर' की, बस नुमाइश नहीं करता
कई बार वरना सिर्फ रौशनी के लिए चाँद को कमरे में टांगा था मैंने
Wednesday, October 6, 2010
coffee shop
एक वीरां coffee shop के कोने की मेज़ पे,
मैं coffee के घूँट के साथ पीता हूँ,
तन्हाई दोपहर की....
मैं coffee के घूँट के साथ पीता हूँ,
तन्हाई दोपहर की....
IMAGE
तपती दोपहर में....
थकी हारी सड़क...
कुछ देर के लिए..
आराम करती हैं ..... मोड़ पे खड़े बूढ़े बरगद की छाओं में...
थकी हारी सड़क...
कुछ देर के लिए..
आराम करती हैं ..... मोड़ पे खड़े बूढ़े बरगद की छाओं में...
Thursday, September 30, 2010
ताक-झाँक - Written a few hrs before the verdict of the Ram Janmabhoomi Babri Masjid Case
इंसान सुनाएगा आज फैसला के किसका ख़ुदा कहाँ रहेगा..
ख़ुदा का मुआमला हैं..हमे क्या ज़रुरत हैं परेशान होने की?
हमे क्या ज़रुरत हैं दूसरों के मुआमलो में दखल देने की?
जिसने काइनात बनाई हैं पूरी..वो क्या चंद लोगों की बात मानके खुश हो जाएगा?
बेशक बना सकता हैं घर अपने लिए जहां चाहे वो...
हम क्यों परेशान होते हैं के कहाँ रहेगा?
दुसरे के घर में ताक-झाँक करने की आदत से हम कब बाज़ आयेंगे?
ख़ुदा का मुआमला हैं..हमे क्या ज़रुरत हैं परेशान होने की?
हमे क्या ज़रुरत हैं दूसरों के मुआमलो में दखल देने की?
जिसने काइनात बनाई हैं पूरी..वो क्या चंद लोगों की बात मानके खुश हो जाएगा?
बेशक बना सकता हैं घर अपने लिए जहां चाहे वो...
हम क्यों परेशान होते हैं के कहाँ रहेगा?
दुसरे के घर में ताक-झाँक करने की आदत से हम कब बाज़ आयेंगे?
Wednesday, September 29, 2010
रंग
एक खाली उदास सफ़ेद कमरा
बीच में एक बूढा कथ्थई center table
उसपे पड़ा हुआ एक पीला पड़ गया mug
mug में भाप उगलती हुई black coffee
खिड़की से अन्दर आती केसरी धुप
जब मुझ तक पहुँचती हैं coffee की गीली बेरंग भाप से छनके
तुम्हारी तस्वीर बानाती हैं सांतों रंगों से मेरी नज़रों के सामने
मेरा कमरा कुछ देर के लिए रंगों से भर जाता हैं...
बीच में एक बूढा कथ्थई center table
उसपे पड़ा हुआ एक पीला पड़ गया mug
mug में भाप उगलती हुई black coffee
खिड़की से अन्दर आती केसरी धुप
जब मुझ तक पहुँचती हैं coffee की गीली बेरंग भाप से छनके
तुम्हारी तस्वीर बानाती हैं सांतों रंगों से मेरी नज़रों के सामने
मेरा कमरा कुछ देर के लिए रंगों से भर जाता हैं...
Tuesday, September 28, 2010
बादल
एक बादल भरी दोपहरी में झील की सतह पर, ढूंढ रहा था एक बूँद, जो सबसे अज़ीज़ थी उसे
और कल रात बरसात में अपने दोस्तों के साथ झील में नहाने को टपकी थी...
बदल को बिना बताये..और अब तक वापस नहीं आई थी...
मुझे देखा तो अपनी भरी आँखों से बादल ने पुछा..."क्या देखा हैं तुमने उसे? छोटी सी थी वो...उसे तो अबतक ठीक से तैरना भी नहीं आता था.."
में बस देखता रह गया उसे...चल दिया वहां से...
मेरी आँखों में झील उतर आई थी....
और कल रात बरसात में अपने दोस्तों के साथ झील में नहाने को टपकी थी...
बदल को बिना बताये..और अब तक वापस नहीं आई थी...
मुझे देखा तो अपनी भरी आँखों से बादल ने पुछा..."क्या देखा हैं तुमने उसे? छोटी सी थी वो...उसे तो अबतक ठीक से तैरना भी नहीं आता था.."
में बस देखता रह गया उसे...चल दिया वहां से...
मेरी आँखों में झील उतर आई थी....
Subscribe to:
Posts (Atom)