Sunday, March 13, 2011

मैं और मेरा शायर

तुम कौन हो जो मेरे अन्दर रहते तो हो..
पर मुझसे जुदा हो?
मेरा साया हो के मेरा ही दूसरा रूप हो?

तुम्हे दुनिया से कोई लेना-देना नहीं
न फिक्र पैसों की, न दुनियादारी की
न तुम्हे कुछ काम है, नाही आराम करते हो कभी

मैं सोचता हूँ कभी
के कौनसा मैं..मैं हूँ?
वो मैं जो जीता है?या वो मैं जो बस जीने का नाटक करता है?

पर तुम सोचते हो...मुझसे जुदा कभी, कभी बिलकुल मेरी ही तरह
कभी मेरे ही ख्यालों को कागज़ पे रखते हो..
तो कभी मेरी ही जुबां को लफ्ज़ देते हो

तुम्हारा लिखा कभी पढता हूँ तो लगता है
के मैं-तुम बन जाऊं, तुम्हे मैं बना लूं
ऐसे ही जीऊँ, जैसे जीना होता है

पर कभी कभी तुम भी छुप जाते हो दोस्त
काम के पीछे से कभी, या कभी रोज़ मर्रा की जद्दोजेहद में से निकालना पड़ता है तुम्हे
तुम रहो मेरे साथ, मेरे सामने ताके मैं जीता रहूँ....

एक अरसा हो गया है दोस्त कुछ लिखा नहीं तुमने..
कुछ लिख दो के पता चले तुम ज़िन्दा हो अब भी मुझ में
कुछ लिख दो के पता चले..मैं अब भी जी रहा हूँ......

Tuesday, February 15, 2011

एक रुकी हुई बात

एक रुकी हुई बात
खाली जाम फिर से भरने तलक सन्नाटा
एक भी कश लिए बगैर जलके बुझ गई सिगरेट
एक टेलीफोन नंबर
notepad पे लिख के मिटाए हुए कुछ लफ्ज़
एक पुराना ख़त

एक बात अब भी रुकी हुई है लबों पर
एक और शाम फिरसे कुछ कहे बगैर गुज़र गई
सोच फिरसे बजेगी रात भर खली कमरे में

एक और रात फिर नींद नहीं आएगी

Tuesday, January 18, 2011

मैं,
तुम,
मोहोब्बत,
फासले,
तन्हाईयाँ,
फरियाद,
शिकस्त,
आदत,
ग़ज़ल...

Wednesday, November 24, 2010

Thursday, October 21, 2010

मैंने

एक बार पूरी काइनात से पंगा ले लिया था मैंने...
एक बार चाँद और सूरज के बीच झगडा करवा दिया था मैंने

मुझे क्या पता था के वो सचमुच चला जाएगा
सिर्फ मजाक में ही तो उसे अलविदा कहा था मैंने

और तबसे भागता फिरता हैं खुदा मुझसे
जबसे इंसानी ताक़त का एक नमूना दिखाया था मैंने

पता नहीं था के पूरे-पुरे शहर बहा लेजायेगा वो
बस यूँही एक बार सावन को अपनी पूरी ताक़त दिखने को कहा था मैंने

चाँद टुकड़े टुकड़े हो के गिर पड़ा था कल रात को
गुस्से में आकर एक तारा आसमान की तरफ फेंका था मैंने

दीवानगी अभी भी उतिनी ही हैं 'काफिर' की, बस नुमाइश नहीं करता
कई बार वरना सिर्फ रौशनी के लिए चाँद को कमरे में टांगा था मैंने

Wednesday, October 6, 2010

coffee shop

एक वीरां coffee shop के कोने की मेज़ पे,
मैं coffee के घूँट के साथ पीता हूँ,
तन्हाई दोपहर की....

IMAGE

तपती दोपहर में....
थकी हारी सड़क...
कुछ देर के लिए..
आराम करती हैं ..... मोड़ पे खड़े बूढ़े बरगद की छाओं में...